*अभिमान तब आता है* *जब हमे लगता है हमने कुछ काम किया है,* *और* .. .. .. *सम्मान तब मिलता है .. .. ..* *जब दुनिया को लगता है,* *कि आप ने कुछ महत्वपूर्ण काम किया है ।।*

घमंड से अपना *सर* ऊँचा न करे...
जीतने वाले भी ....
अपना *गोल्ड मैडल*...
सिर झुका के हासिल करते है




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आहिस्ता से पढना- पछतायेगा कौन ? 
एक वाक्य भी दिल में बैठ गया तो कविता सार्थक हो जायेगी -
मैं रूठा ,
      तुम भी रूठ गए
                      फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है ,
           कल खाई होगी
                           फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप ,
     तुम भी चुप
          इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन ?
छोटी बात को लगा लोगे दिल से ,
                 तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और  तुम भी बिछड़कर ,
                   सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
न मैं राजी ,
       न तुम राजी ,
             फिर माफ़ करने का बड़प्पन
                                       दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी ,
                        तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे ,
       एक तेरे भीतर भी ,
               इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
              फिर इन लम्हों में अकेला
                                     रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन
           एक ने आँखें....
                तो कल इस बात पर फिर
                                      पछतायेगा कौन ?




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      *कोई आपके लिए रूपये*
               *खर्च करेगा तो कोई*
                *समय खर्च करेगा,*
             *समय खर्च करने वाले*
         *व्यक्ति को हमेशा अधिक*
              *महत्व और सम्मान*
                 *देना क्योंकि...*
           *वह आपके पीछे अपने*
           *जीवन के वो पल खर्च*
          *कर रहा है जो उसे कभी*
             *वापिस नही मिलेंगे !!*



*अभिमान तब आता है*
*जब हमे लगता है हमने कुछ काम किया है,*
                *और* .. .. ..
    *सम्मान तब मिलता है .. .. ..*
*जब दुनिया को लगता है,*
*कि आप ने कुछ महत्वपूर्ण काम किया है ।।*



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रेती मा पडेली खाँड़ कीडी वीणी शके पण हाथी नही
तेथी क्यारेय नाना माणस ने नानों न गणवो,
क्यारेक नानों माणस मोटु काम करी जाय छे,

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दर्पण जब चेहरे का दाग दिखाता है,
तब हम दर्पण नहीं तोडते बल्कि दाग साफ करते हैं।
उसी प्रकार हमारी कमी बताने वाले पर क्रोध करने के बजाय कमी दूर करना श्रेष्ठ है।  







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"मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो परंतु उसकी
परछाई सदैव काली होती है...!!
"मैं श्रेष्ठ हूँ" यह आत्मविश्वास है
लेकिन....
"सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूँ"यह अहंकार है !


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            "अंहकार" और "पेट"
               जब बढ़ जाता है,
                  तो 'इंसान....
                चाह कर भी
        "गले" नहीं मिल सकता..!!"
     
      





   
.
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.
.
          "कर्म" एक ऐसा रेस्टोरेंट है ,
               जहाँ ऑर्डर देने की
                  जरुरत नहीं है
             हमें वही मिलता है जो
                 हमने पकाया है।
       
            जिंदगी की बैंक में जब
             " प्यार " का " बैलेंस "
                 कम हो जाता है
             तब " हंसी-खुशी " के
           चेक बाउंस होने लगते हैं।
                 इसलिए हमेशा
                 अपनों के साथ
           नज़दीकियां बनाए रखिए ।
.
.
.

*"रोने से तो आंसू भी पराये हो जाते हैं,*
*"लेकिन मुस्कुराने से...*
*पराये भी अपने हो जाते हैं !*
*"मुझे वो रिश्ते पसंद है,*
*"जिनमें " मैं " नहीं " हम " हो !!*
*"इंसानियत दिल में होती है, हैसियत में नही,*
*"उपरवाला कर्म देखता है, वसीयत नही..!!*
          .
.
.
                *घमंड* और *पेट*
                जब ये दोनों बढतें हैं..
          तब *इन्सान* चाह कर भी
       किसी को गले नहीं लगा सकता..
      जिस प्रकार नींबू के रस की एक बूँद
     हज़ारों लीटर दूध को बर्बाद कर देती है...
                     ...उसी प्रकार...
                  *मनुष्य* *का* *अहंकार*
              भी अच्छे से अच्छे संबंधों को
                     बर्बाद कर देता है".!!!
      
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: *" नफरतों में क्या रखा हैं ..,*
*मोहब्बत से जीना सीखो..,*
            *क्योकि*
*ये दुनियाँ न तो हमारा घर हैं ...*
                *और ...*
*न ही आप का ठिकाना ..,*
*याद रहे !                                        .       दूसरा मौका सिर्फ*                          
*कहानियाँ देती हैं , जिन्दगी नहीं....*..                                .                         *मानव कितने भी प्रयत्न कर ले*
            *अंधेरे में छाया*
            *बुढ़ापे में काया*
                    *और*
          *अंत समय मे माया*
       *किसी का साथ नहीं देती*
           
     *""सदा मुस्कुराते रहिये""*
 

सुबह की नींद इंसान के इरादों को कमज़ोर करती है


सुबह की नींद इंसान के इरादों
को कमज़ोर करती है |
मंज़िलों को हाँसिल करने वाले कभी देर तक सोया नहीं करते ।
वो आगे बढ़ते है जो सूरज को जगाते है,
वो पीछे रह जाते हैं जिनको सूरज जगाता है!



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हार  से इंसान  खत्म  नही  होता  है,
सही  मायने  में  इंसान  खत्म
तब  होता  है,
जब  कोशिश  करना  छोड़  दे...
.
मुश्किल  समय  में
हमेशा  खुद  से  कहते  रहो  कि
"दौड़  अभी  खत्म  नही  हुई  है 
क्योंकि
मैं  अब  तक जीता  नही  हूँ।"



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*मेरे गुरु कहते है* …
      *मत सोच की तेरा*
        *सपना क्यों पूरा नहीं होता*
*हिम्मत वालो का इरादा*
         *कभी अधुरा नहीं होता*
*जिस इंसान के कर्म*
                 *अच्छे होते है*
*उस के जीवन में कभी*
             *अँधेरा नहीं होता* ..





*वृक्ष के नीचे पानी डालने से सबसे ऊंचे पत्ते पर भी पानी पहुँच जाता है ,* *उसी प्रकार प्रेम पूर्वक किये गए कर्म परमात्मा तक पहुंच जाते हैं*।

_*धर्म ग्रंथ में साफ़ शब्दो मे लिखा है..*_
_*निराश मत होना..*_
_*कमजोर तेरा वक्त है..*_
_*तू नही........*_
_*ये संसार "जरूरत" के नियम पर चलता है....*_
_*सर्दियो में जिस "सूरज"*_
_*का इंतजार होता है,*_
_*उसी "सूरज" का गर्मियों में*_
_*तिरस्कार भी होता है.....*_
_*आप की कीमत तब तक होगी जब तक आपकी जरुरत है...!*_
*"तालाब एक ही है..,*
*उसी तालाब मे हंस मोती चुनता है और बगुला मछली...!*
*सोच सोच का फर्क होता है...!*
*आपकी सोच ही आपको बड़ा बनाती है...!!*
*यदि हम गुलाब की तरह खिलना*
*चाहते हो तो  काँटों के साथ*
*तालमेल की कला सीखनी होगी*...
          
   
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जो सफर की शुरुआत करते हैं,
        वे मंजिल भी पा लेते हैं.
                   बस,
         एक बार चलने का
         हौसला रखना जरुरी है.
                 क्योंकि,
         अच्छे इंसानों का तो
      रास्ते भी इन्तजार करते हैं...!
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*कर्म करो तो फल मिलता है,*
       आज नहीं तो कल मिलता है।
*जितना गहरा अधिक हो कुँआ,*
        उतना मीठा जल मिलता है ।
*जीवन के हर कठिन प्रश्न का,*
        जीवन से ही हल मिलता है।
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*जितना  बडा  सपना  होगा*
  *उतनी  बडी तकलीफें  होगी*
     *और  जितनी  बडी*
   *तकलीफें  होगी  उतनी* *बडी*      
*कामयाबी होगी*

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नाराज़ ना होना कभी यह सोचकर क़ि....
काम मेरा और नाम किसी और का हो रहा है ।
यहाँ सदियों से जलते तो "घी" और "बाती" हैं...
पर लोग कहते हैं कि 'दीपक' जल रहा है.....

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सफलता जिस ताले में बंद रहती है
वह दो चाबियों से खुलता है
        एक कठिन परिश्रम
                 और
          दूसरा दृढ़ संकल्प।


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      धनवान बनने के लिए
         एक-एक कण का
       संग्रह करना पडता है,
                  औऱ
       गुणवान बनने के लिए
         एक-एक क्षण का
     सदुपयोग करना पडता है..!
         इस जीवन का पैसा
अगले जन्म में काम नहीं आता
     मगर इस जीवन के सही कर्म
आपको जन्मो जन्म तक जीवित रखेंगे.


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*मेरे गुरु कहते है* …
      *मत सोच की तेरा*
        *सपना क्यों पूरा नहीं होता*
*हिम्मत वालो का इरादा*
         *कभी अधुरा नहीं होता*
*जिस इंसान के कर्म*
                 *अच्छे होते है*
*उस के जीवन में कभी*
             *अँधेरा नहीं होता* ..
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*" गीता " मे स्पष्ठ  शब्दो मे लिखा है* ,
*निराश मत होना* ,
*कमजोर तेरा वक्त है* ,
" *तु* " *नहि* ।
 *'ज़िन्दगी*' *में कभी किसी* *'बुरे दिन*' *से सामना हो जाये तो* . . .
*इतना* *'हौसला*' *जरूर रखना* -
*'दिन*' *बुरा था*. . . *'ज़िन्दगी*' *नहीं*.....

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*वृक्ष के नीचे पानी डालने से सबसे ऊंचे पत्ते पर भी पानी पहुँच जाता है ,*
*उसी प्रकार प्रेम पूर्वक किये गए कर्म परमात्मा तक पहुंच जाते हैं*।
*सेवा सभी की करिये मगर,आशा किसी से भी ना रखिये*
*क्योंकि सेवा का सही मूल्य भगवान् ही दे सकते हैं इंसान नहीl*.”॥*
                     

सब कुछ कॉपी हो सकता है चरित्र और व्यवहार नहीं...

           अपमान करना किसी के
            स्वभाव में हो सकता है...
                पर सम्मान करना
        हमारे संस्कार में होना चाहिए…
          सब कुछ कॉपी हो सकता है
           चरित्र और व्यवहार नहीं...

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‘ खाई ’ में गिरा इंसान ऊपर आ
   सकता है, पर ‘चरित्र’ में गिरा
        इंसान कभी ऊपर नहीं
               आ सकता।
                                - अज्ञात

            
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चरित्र ; किसी व्यक्ति के विश्वास , मूल्य , सोच-विचार और व्यक्तित्व का मेल होता है , इसका पता हमारे कार्य और व्यवहार से चलता है ।
चरित्र की रक्षा किसी अन्य धन की रक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है । 
जीवन में सच्ची सफलता पाने के लिए व्यक्ति का चरित्रवान होना जरूरी है , सच्ची सफलता से आशय एक ऐसे उद्देश्य की प्राप्ति से है , जो हमारे साथ-साथ समाज के लिए भी कल्याणकारी हो , जो शाश्वत हो और जिसकी  प्राप्ति हमें हर प्रकार से संतुष्टि दे सके और जिसे पाने के बाद किसी अन्य चीज को पाने की ईच्छा न रहे , ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति ही सच्ची सफलता कहलाती है ।
चूँकि सफलता पाने का मार्ग पड़ाव-दर-पड़ाव पार किया जाता है , जिसमें कई छोटे-बड़े लक्ष्य सम्मिलित होते हैं । 
फिर भी सफलता और सुख इन दोनों की परिभाषा प्रत्येक इंसान के लिए अलग-अलग होती है । कोई बहुत सारे पैसे कमाने को सफलता मानता है तो कोई किसी विशेष पद पर पहुँचने और प्रसिद्धि पाने को सफलता समझता है , अतः संक्षेप में कह सकते हैं किकिसी निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति करना ही सफलता कहलाती है ।

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दोस्तों ! चरित्र के बिना व्यक्ति का जीवन वैसा ही है जैसे बिना रीढ़ की हड्डी के शरीर होता है किन्तु आज के समय में तो लोग चरित्र से ज्यादा महत्व धन-दौलत को देते हैं , जिसके पास खूब पैसा,नाम व बड़ा घर-व्यापार है वह सामाजिक जीवन में सफल माना जाता है भले ही उसका चरित्र कैसा भी हो । 
फिर भी , किसी भी समय में चरित्र की महत्ता  कम नहीं आँकी जा सकती क्योंकि चरित्रवान व्यक्ति की प्रशंसा हर कोई करता है ।
 चरित्र , निर्मित कैसे होता है 
चरित्र अथवा स्वभाव , अच्छा और बुरा दोनो प्रकार का होता है । सामान्य तौर पर , हम चरित्र या स्वभाव से आशय सद्चरित्र या अच्छे स्वभाव का लेते हैं तथा अच्छे चरित्र कई में कई सदगुण विद्यमान होते है जैसे - धैर्य , साहस , ईमानदारी , सत्य , क्षमा , दया और सहानभूति आदि । 
वास्तव में , हम चरित्र-निर्माण से अधिक ध्यान अपने भविष्य-निर्माण पर देते है क्योंकि माता-पिता भी अपने बच्चों को यही समझाते हैं कि भविष्य बनाना , बहुत ज्ञान का अर्जन करना तथा धनवान बनना है लेकिन सद्चरित्र के अभाव में भौतिक धन होकर भी व्यक्ति निर्धन है तथा उसका ज्ञान भी अनुपयोगी है ।
इसीलिए , हमें चरित्र-निर्माण पर ध्यान देना होगा , बजाय भविष्य निर्माण के ।यदि बच्चे चरित्रवान हों तो उनका भविष्य स्वयमेव सुनहला हो जाएगा ।
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को सदैव सही मार्ग पर प्रशस्त करें , वे न सिर्फ अच्छे संस्कार और सद्चरित्र के लिए मार्गदर्शन दें बल्कि अपने कर्मों में भी यह भावना दिखाएँ ।
प्रारंभिक तौर पर , मनुष्य अपनी चारित्रिक विशेषताएँ माता-पिता और घर-परिवार के माहौल से ही सीखता है , बचपन में यदि कोई विशेष घटना हुई हो तो उसका प्रभाव भी चरित्र के निर्माण पर पड़ता है । कभी-कभी माता-पिता और बच्चों के कई गुण समान भी सकते हैं लेकिन कभी-कभार इसके उलट भी ।
            फिर भी , हर व्यक्ति अपने आप में बिल्कुल अलग है , सभी का स्वभाव अलग-अलग होता है क्योंकि चरित्र बनता है - विचारों से और प्रत्येक व्यक्ति के विचार अलग-अलग होते हैं ।
विचार ही चरित्र का निर्माण करते हैं इसलिए चरित्र को बदलने के लिए विचारों को बदलना जरूरी है । अच्छे चरित्र के लिए हमें उत्तम विचारों की जरूरत होती है ।

कीसी ने फूल से पूछा की जब तुम्हें तोड़ा गया तो तुम्हें दर्द नहीं हुआ " "फूल ने जवाब दीया तोड़ने वाला इतना खुश था की मैं अपना दर्द भी भूल गया।


"..  कीसी ने फूल से पूछा की जब
         तुम्हें तोड़ा गया तो तुम्हें
                दर्द नहीं हुआ "
"फूल ने जवाब दीया तोड़ने वाला
         इतना खुश था की मैं
                अपना दर्द भी भूल गया।



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दिल की बात,
साफ़ साफ़ कह देनी चाहिए,
क्योंकि,
बता देने से 'फैसले' होते हैं,
ना बताने से 'फ़ासले'..


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दो पल की जिन्दगी के दो असूल
 
निखरो तो फूलों की तरह
और बिखरो तो खुशबू की तरह
किसी को प्रेम देना
सबसे बड़ा उपहार है और
किसी का प्रेम पाना सबसे बड़ा सम्मान है



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एक मित्र ने पूछा मुझे :
रोज सुबह एक विचार बांटते हो ,
क्या मिलता है आपको ??
हमने हँस कर कह  दिया :
लेना देना तो व्यापार है ,
बिन अपेक्षा दे वहीँ तो प्यार है..!!!

     



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आसु सुकाया पछी जे मलवा आवे ऐ संबंध....
ने...
आसु पहेला मलवा आवे ऐ प्रेम....


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       *एक प्यार भरा सँदेश* 
"विश्वास किसी पर इतना करो कि
वो तुम्हे छलते समय खुद को दोषी समझे
                  और
प्रेम किसी से इतना करो कि
उसके मन में सदैव तुम्हें खोने का डर बना रहे...!!!.

*पाप और पूण्य क्या है..??*


     *पाप और पूण्य क्या है..??*
            *मुझे नही पता*
    *मुझे तो बस ये ही पता है...,*
     *जिस कार्य से किसी का*
          *दिल दुःखे वो पाप..,*
                   *और...*
   *किसी के चेहरे पे हँसी आये..*
               *वो पूण्य..*
       
_________________________________


 *पूण्य क्या है..??*

१. प्रस्तावना

दैनिक जीवन में कर्म करते समय, हम उन कर्मों का फल पुण्य एवं पाप के रूप में भोगते हैं । पुण्य एवं पाप हमें अनुभव होनेवाले सुख और दुख की मात्रा निर्धारित करते हैं । अतएव यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि पापकर्म से कैसे बचें । वैसे तो अधिकांश लोग सुखी जीवन की आकांक्षा रखते हैं; परन्तु जिन लोगों को आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा है, वे यह जानने की जिज्ञासा रखते हैं कि क्यों मोक्षप्राप्ति के आध्यात्मिक पथ में पुण्य भी अनावश्यक हैं ।

२. पुण्य एवं पाप क्या है ?

पुण्य अच्छे कर्मों का फल है, जिनके कारण हम सुख अनुभव करते हैं । पुण्य वह विशेष ऊर्जा अथवा विकसित क्षमता है, जो भक्तिभाव से धार्मिक जीवनशैली का अनुसरण करने से प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ मित्रों की आर्थिक सहायता करना अथवा परामर्श देना पुण्य को आमन्त्रित करना है । धार्मिकता तथा धर्माचरण की विवेचना अनेक धर्मग्रंथों में विस्तृतरूप से की गई है । पुण्य के माध्यम से हम दूसरों का कल्याण करते हैं । उदाहरण के लिए कैन्सर पीडितों की सहायता के लिए दान करने से कैन्सर से जूझ रहे अनेक रोगियों को लाभ होगा, जिससे हमें पुण्य मिलेगा ।
पाप क्या है, पाप बुरे कर्म का फल है, जिससे हमें दुख मिलता है । किसी और का बुरा चाहने की इच्छा से कर्म करने पर पाप उत्पन्न होता है । यह उन कर्मों से उत्पन्न होता है जो प्रकृति अथवा ईश्वर के नियमों के विपरीत अथवा उसके विरुद्ध हों । उदाहरण के लिए यदि कोई व्यापारी अपने ग्राहकों को ठगता है, तो उसे पाप लगता है । कर्त्तव्य-पूर्ति नहीं करने पर भी पाप उत्पन्न होता है, उदा. जब कोई पिता अपने बच्चों की आवश्यकताओं की ओर ध्यान नहीं देता अथवा जब वैद्य अपने रोगियों का ध्यान नहीं रखता ।
पुण्य और पाप इसी जन्म में, मृत्यु के उपरांत अथवा आगामी जन्मों में भोगने पडते हैं ।
पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्य और पाप लेन-देन के हिसाब से सूक्ष्म होते हैं; क्योंकि लेन-देन का हिसाब समझना तुलनात्मक रूप से सरल है उदा. परिवार के स्तर पर, परन्तु यह समझना बहुत कठिन है कि क्यों किसीने एक अपरिचित का अनादर किया ।

३. पुण्य और पाप के कारण

पुण्यसंचय के अनेक कारण हो सकते हैं । प्रमुख कारण हैं :
  • परोपकार
  • धर्मग्रंथों में बताए अनुसार धर्माचरण
  • दूसरे की साधना के लिए त्याग करना । उदाहरण के लिए यदि कोई बहू अपने कार्य से छुट्टी लेकर घर संभालती है, जिससे उसकी सास तीर्थयात्रा पर जा सके, तो बहू को सासद्वारा अर्जित तीर्थयात्रा के फल का आधा भाग मिलेगा । तथापि जहांतक संभव हो, दूसरों पर निर्भर होकर साधना न करें ।
पाप संचय के कुछ कारण हैं :
  • क्रोध, लालच एवं ईर्ष्या के रूप में स्वार्थ एवं वासना व्यक्ति को पाप के लिए उद्युक्त करते हैं ।
  • सिद्धांतहीन अथवा क्रूर होना
  • किसी भिखारी से अपमानजनक बात करना
  • मांस एवं मदिरा का सेवन करना
  • प्रतिबन्धित वस्तुएं बेचना, ऋण न चुकाना, काले धनका व्यवहार, जुआ
  • झूठी गवाही देना, झूठे आरोप लगाना
  • चोरी करना
  • दुराचार, व्यभिचार, बलात्कार इत्यादि
  • हिंसा
  • पशुहत्या
  • आत्महत्या
  • ईश्वर, मंदिर, आध्यात्मिक संस्था इत्यादि की संपत्तिका अनावश्यक व्यय एवं दुरुपयोग इत्यादि
  • अधिवक्ताओं को पाप लगता है, क्योंकि वे सत्य को असत्य एवं असत्य को सत्य बनाते हैं ।
  • पति को पत्नी के पापकर्म का आधा फल भोगना पडता है; क्योंकि उसने अपनी पत्नी को पापकर्म करने से न रोकने के कारण वह पाप का भागीदार बनता है ।
  • पतिद्वारा अधर्म से अर्जित संपत्ति व्यय करनेवाली तथा ज्ञात होने पर भी उसे न रोकनेवाली पत्नी को पाप लगता है ।
  • पापी के साथ एक वर्ष रहनेवाला भी उसके पाप का भागी हो जाता है ।

४. पुण्य एवं पाप का प्रभाव

४.१ सुख के रूप में पुण्य का प्रभाव

पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्य की मात्रा के अनुपात में व्यक्ति को पृथ्वी पर उतना सुख मिलता है और अंत में पृथ्वी पर अपने जीवनकाल में अपेक्षासहित कर्म से अर्जित पुण्य से वे स्वर्ग में सुख पाते हैं :
  • सुसंस्कृत एवं धनाढ्य परिवार में जन्म
  • बढती आय
  • सांसारिक सुख
  • इच्छापूर्ति
  • स्वस्थ जीवन
  • समाज, संस्था एवं शासनद्वारा प्रशंसा एवं सम्मान
  • आध्यात्मिक प्रगति
  • मृत्यु के उपरांत स्वर्ग सुख
मनुष्य जन्म, अच्छे कुल-परिवार में जन्म, धन, दीर्घायु, स्वस्थ शरीर, अच्छे मित्र, अच्छा पुत्र, प्रेम करनेवाला जीवनसाथी, भगवद्-भक्ति, बुद्धिमत्ता, नम्रता, इच्छाओं पर नियंत्रण एवं पात्र व्यक्ति को दान देने की ओर झुकाव, ऐसे पहलू हैं, जो पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के बिना असंभव है । जब यह सब हो, तो जो पुण्यात्मा इसका लाभ उठाता है और साधना करता है, उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है ।
जब समष्टि पुण्य बढता है, तो राष्ट्र सिद्धांत (दर्शन) और आचरण में सर्वश्रेष्ठ होता है तथा समृद्ध होता है ।

४.२ दुख के रूप में पाप का प्रभाव

कृपया पढें हमारा लेख पाप का फल

५. पुण्य एवं पापार्जन कैसे होता है ?

पुण्य एवं पाप का सिद्धांत समझने के लिए किसी भी कर्म का उद्देश्य जानना महत्त्वपूर्ण है । निम्नलिखित सारणी से यह स्पष्ट होगा, जहां हमने धनार्जन के कर्म की मनोवृत्ति तथा उसे खर्च करने का उद्देश्य विभिन्न उदाहरणों से समझाया है । इससे उत्पन्न पुण्य एवं पाप की मात्रा प्रत्येक उदाहरण के सामने दी है ।


६. पुण्य की सीमाएं

आध्यात्मिक प्रगतिके परिप्रेक्ष्य में, पुण्य की अपनी सीमा है ।

६.१ पुण्य का फल भोगना पडता है

पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्यवान जीवन, मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति को स्वर्गलोक ले जाता है, परन्तु एकबार पुण्य समाप्त हो जाए, तो व्यक्ति को पृथ्वी पर पुनः अगला जन्म लेना पडता है । इस कारण पुण्य भी एक प्रकार का बन्धन है । केवल साधना ही हमें मोक्षतक ले जाती है ।

६.२ सुख भोगने से अंततः पुण्य समाप्त हो जाते हैं

पुण्य एवं पाप क्या है, प्रत्येक क्षण सुख भोगने पर, हमारा पुण्य समाप्त हो जाता है, इसलिए व्यक्ति को पुण्य बढाने के लिए परिश्रम करना पडता है । इसके लिए पुण्यप्रद कर्म अथवा साधना करनी पडती है । अन्तर केवल इतना है कि पुण्यप्रद कर्मों से सुख मिलता है, जबकि साधना से आध्यात्मिक प्रगति होती है अर्थात इससे नंद मिलता है, जो पुण्य-पाप तथा सुख-दुख से परे होता है, इसका उपफल सुख है ।

७. संक्षेप में – पुण्य एवं पाप क्या है!

पुण्य एवं पाप में अन्तर के साथ ही उनकी गहराई और उनके प्रभाव की महत्ता समझने से हम अपने आचरण और कर्मों को नियन्त्रित कर सकते हैं । तथापि दोनों से मुक्त होने हेतु नियमित साधना करना आवश्यक है ।




 *पाप क्या है..??*

१. परिचय- पाप क्या है ?

प्रतिदिन के कर्म करते समय हमसे कई प्रकार के पाप कर्म होते हैं । उदा. झाडू लगाते समय कीडे-मकौडों की हत्या, दूसरों से कठोर बोलना इत्यादि । पाप के विषय को अच्छे से समझने के लिए हम कुछ प्रकार के पाप और उसके परिणाम किसे भुगतने पडते हैं यह देखेंगे ।

२. पाप के प्रकार

२.१ पाप से कौन प्रभावित होता है, इस आधार पर उसका वर्गीकरण

इस आधार पर कि पाप से कौन प्रभावित होते हैं, ऐसे पाप होते हैं जो अपना और दूसरों का अहित करते हैं, जैसा कि निम्न सारणी में दिखाया है ।
केवल अपना ही अहित करना
कौन प्रभावित होता है, इस आधार पर पाप के प्रकार
केवल अपना ही अहित करना
साधना हेतु नित्य प्रयास न करना
केवल अपना ही अहित करना
अपनी कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण न रखना, अर्थात विभिन्न
इच्छाएं, वासनाएं, क्रोध तथा लोभ पर नियंत्रण न रखना ।
दूसरे का अहित करना
अज्ञानवश अहित होना, उदा. पथपर चलते समय अथवा पानी
उबालते समय अनायास जंतु अथवा जीवाणु मरते हैं ।
दूसरे का अहित करना
स्वेच्छा से दूसरों का अनिष्ट करना

२.२ काया, वाचा एवं मन के अनुसार पाप के प्रकार

व्यक्ति पहले मन में पापकर्म का निश्चय करता है, तत्पश्चात उस पाप का उच्चारण करता है अथवा देह से उसका आचरण करता है । इस प्रकार से मनुष्य तीन प्रकार से पापकर्म करता है, जैसा कि निम्न सारणी में दिखाया है ।
काया, वाचा एवं मन के अनुसार पाप के प्रकार
कायिक पाप
शरीर से किया गया पाप, उदा. चोरी करना, किसी की हत्या करना, व्यभिचार ।
वाचिक पाप
बोलने के कारण किया गया पाप, उदा. अपशब्द बोलना, निंदा करना, असत्य बोलना, असंबद्ध बोलना ।
मानसिक पाप
मन से किए पाप, उदा. दूसरों के धन की अभिलाषा, दूसरों का अनिष्ट सोचना (यहां पर हमारे विचारों से निर्माण होने वाले नकारात्मक स्पंदनों के कारण जो दूसरों को कष्ट होता है, उसके कारण पाप लगता है । यह कुदृष्टि (नजर) लगने की प्रक्रिया समान है ।)
कुदृष्टि से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कृपया कुदृष्टि (नजर) यह लेख पढें ।

३. क्या हम केवल विचारों से पाप कर सकते हैं ?

कर्मयोग के अनुसार, पुण्यमय कर्म का केवल विचार मन में आने से भी पुण्य लगता है, परंतु केवल पापमय विचार से पाप नहीं लगता । उदा. किसी बैंक को लूटने का केवल विचार करने से पाप नहीं लगता, जबकि प्रत्यक्ष में बैंक को लूटने से पाप लगेगा । यहां पर मानसिक पाप के पहले उदाहरण समान, केवल विचार करने से पाप नहीं लगता क्योंकि उससे किसी को हानि नहीं पहुंचती ।
जबकि साधक के मन में आए अनिष्ट विचारों से उसे पाप लगता है । इसमें, क्योंकि साधक का ध्येय स्वयं में ईश्वरीय गुणों का विकास करना होता है तथा ईश्वर उसके लिए साधक को आवश्यक ज्ञान और शक्ति प्रदान करते हैं, अनिष्ट विचारों से ईश्वर की शक्ति का अपव्यय होता है । इसके लिए एक अपवाद है, अनिष्ट शक्तियों के तीव्र कष्ट से पीडित साधकों का अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं रहता ।

४. किसे पाप का परिणाम भोगना पडता है ?

४.१ पाप में भागीदार

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तथा कायिक-वाचिक-मानसिक कैसे भी हो, पाप का समर्थन अथवा उसे बढावा देने वाले व्यक्ति को उसके अनुरूप पाप का परिणाम भोगना पडता है । वह पाप के भागीदार बन जाते हैं । वर्तमान समय में कानून में भी ऐसी व्यवस्था की गई है । हत्या करने वाले के साथ-साथ, हत्या में सहयोग करने वाला भी दोषी होता है ।
पापी मनुष्य के साथ संभाषण, उसका स्पर्श, सान्निध्य, उसके साथ भोजन, उसके साथ एकासन, शयन तथा उसके साथ यात्रा करने से एक व्यक्ति का पाप दूसरे व्यक्ति में संक्रमित होता है ।
जैसे कि सत्संग परम सत्य की संगति है, कुसंग असत्य की संगति है । कुसंग में रहने से बुरे संस्कार हममें निर्माण होते हैं अथवा बढते हैं तथा उससे हमारी आध्यात्मिक अधोगति होती है । इसलिए जो हमें प्रिय होते हैं उन्हें हम बुरी संगति से दूर रहने के लिए कहते हैं ।

४.२ पापसंक्रमण

पवित्र ग्रंथ मत्स्यपुराण में कहा गया है कि पाप सांसर्गिक अथवा अनुवांशिक रोग के समान फैलता है । कोई पाप तुरंत फलित होता ही है ऐसा नहीं है, पापी पर धीरे-धीरे पाप का परिणाम होता है और उसका समूल नाश करता है । यदि व्यक्ति स्वयं अपने पापों को नहीं भोगता तो उसके पुत्र एवं पौत्रों को भोगना पडता है । इस प्रकार पाप तीन पीढियों तक अपना परिणाम दिखाता है । अत: परिवार के अन्य सदस्य तथा अपनी संतति के प्रति हम उत्तरदायी होते हैं ।
पाप के और भी कई उदाहरण हैं जहां पापों की भागीदारी होती है, उदा. पति-पत्नी, कंपनी संचालक तथा वहां के कर्मचारी इत्यादि ।

४.३ समष्टि पाप

प्रारब्ध पर विजय पाने की तथा अपने साथ ही संपूर्ण सृष्टि को सुखी करने की क्षमता ईश्वर ने केवल मुनष्य को ही दी है । ऐसा होते हुए भी, वह अपनी क्षमता का उपयोग स्वार्थ साधने, निष्पाप जीवों पर अत्याचार करने, अन्यों पर अधिकार जमाने इत्यादि के लिए करने लगता है तब अधर्माचरण के कारण समाज समष्टि प्रारब्ध से दूषित होता है ।
इसका प्रभाव संपूर्ण सृष्टि पर होकर संपूर्ण सृष्टि का संतुलन बिगडता है । परिणामस्वरूप, मनुष्य पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, युद्ध जैसी आपदाएं आती हैं । यद्यपि यह आपदाएं दृश्य स्वरूप में होती हैं, तथापि उनके मूलभूत कारण अदृश्य स्वरूप के होते हैं । जब पृथ्वी पर इस प्रकार के समष्टि प्रारब्ध का प्रकोप होता है, तब दुर्जनों के साथ सज्जनों को भी इसके परिणाम भोगने पडते हैं ।

६. सारांश में – पाप के प्रकार

पाप का फल हमारे साथ अन्यों को भी हानि पहुंचाता है, इसलिए यह आवश्यक है कि हम पाप करने से बचें । दूसरों के स्वभाव और कृति को समझना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि दूसरों के पाप देखकर आंख मूंद लेने से हम भी उनके पाप में भागीदार बनते हैं ।
एक कहावत है कि बुरा समय बहुत कुछ सिखा जाता है । हमें यह दृष्टिकोण रखना चाहिए कि हमारा प्रारब्ध हमारे पापों का ही परिणाम है । प्रारब्ध को भोगना साधना ही है ऐसा दृष्टिकोण रखने से हमारी तीव्र आध्यात्मिक प्रगति हो सकती है ।
साधना से हम प्रारब्ध पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अथवा उसे सहन करने की शक्ति हमें मिलती है ।